El Nino Monsoon Impact 2026: भारत की कृषि व्यवस्था मानसून पर गहराई से निर्भर करती है। खेतों की बुवाई से लेकर फसलों की पैदावार तक, हर चरण में बारिश की भूमिका निर्णायक होती है। ऐसे में वैश्विक जलवायु घटनाएं जब मानसून को प्रभावित करती हैं, तो उसका सीधा असर किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। मौजूदा परिदृश्य में मानसून को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, वे सतर्क रहने की सलाह देते हैं।
बदलती जलवायु और मानसून का समीकरण
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का व्यवहार अस्थिर हुआ है। कभी अत्यधिक बारिश, तो कभी लंबे सूखे की स्थिति देखने को मिलती है। इसी कड़ी में समुद्री सतह के तापमान में होने वाले बदलाव, खासकर प्रशांत महासागर में, मानसून की दिशा और ताकत को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर बनने वाली परिस्थितियां भारतीय मानसून के लिए बेहद अहम हो जाती हैं।
ला-नीना से न्यूट्रल स्थिति की ओर बढ़ता मौसम
वर्तमान समय में प्रशांत महासागर में ला-नीना जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं। आमतौर पर ला-नीना को भारत के लिए अनुकूल माना जाता है क्योंकि इससे मानसून मजबूत रहता है और बारिश का वितरण बेहतर होता है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्थिति अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। अनुमान है कि आने वाले कुछ हफ्तों में ला-नीना का प्रभाव कम होकर तटस्थ यानी न्यूट्रल स्थिति में बदल सकता है।
न्यूट्रल चरण क्यों है महत्वपूर्ण
न्यूट्रल स्थिति का अर्थ है कि न तो ला-नीना और न ही एल-नीनो का स्पष्ट प्रभाव रहेगा। इस चरण में मौसम अपेक्षाकृत संतुलित रह सकता है, लेकिन यही वह समय होता है जब आगे की दिशा तय होती है। यदि इसके बाद एल-नीनो विकसित होता है, तो मानसून पर नकारात्मक असर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
एल-नीनो की आहट और बढ़ती चिंता
किसानों और नीति निर्माताओं के लिए सबसे चिंता का विषय एल-नीनो के संकेत हैं। मौजूदा आकलनों के अनुसार इस वर्ष “इवॉल्विंग एल-नीनो” जैसी स्थिति बन सकती है। इसका मतलब यह है कि मानसून की शुरुआत सामान्य या थोड़ी बेहतर हो सकती है, लेकिन जैसे-जैसे मौसम आगे बढ़ेगा, एल-नीनो का प्रभाव बढ़ने लगेगा।
मानसून के दूसरे चरण पर असर
इतिहास बताता है कि एल-नीनो का असर खासकर मानसून के मध्य और अंतिम चरण में ज्यादा दिखाई देता है। जुलाई और अगस्त के महीनों में, जब खरीफ फसलों को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है, तब बारिश में कमी आ सकती है। इससे फसलों की बढ़वार रुक सकती है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
पुराने अनुभव क्या सिखाते हैं
पिछले दशकों में ऐसे कई उदाहरण मिले हैं जब ला-नीना के तुरंत बाद एल-नीनो विकसित हुआ और मानसून कमजोर पड़ा। 2014 और 2018 जैसे वर्षों में देश के कई हिस्सों में कम बारिश दर्ज की गई, जिससे सूखे जैसी परिस्थितियां बनीं। इन वर्षों में बारिश का वितरण असमान रहा—कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा हुई, जबकि कई इलाकों में लंबे समय तक सूखा बना रहा।
सूखे का सीधा असर खेती पर
कम या असमान बारिश का मतलब है सिंचाई पर बढ़ती निर्भरता, लागत में इजाफा और पैदावार में कमी। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं।
पूर्वानुमान मॉडल क्या कह रहे हैं
मौसम से जुड़े आधुनिक मॉडल संकेत दे रहे हैं कि मानसून के दूसरे भाग में एल-नीनो के सक्रिय होने की संभावना 50 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। हालांकि अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, क्योंकि मार्च के बाद उपलब्ध होने वाले आंकड़े ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करेंगे। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि इन संकेतों को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं होगी।
समय से तैयारी ही सबसे बड़ा उपाय
अनिश्चित मौसम के दौर में सबसे अहम है समय रहते तैयारी करना। किसानों को फसल चयन, बुवाई का समय और सिंचाई प्रबंधन में लचीलापन अपनाने की जरूरत होगी। कम पानी में पनपने वाली किस्मों पर विचार करना और जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना भविष्य के जोखिम को कम कर सकता है।
किसानों के लिए व्यावहारिक सुझाव
बदलते मौसम को देखते हुए किसानों को कुछ व्यावहारिक कदम उठाने चाहिए। जैसे, खेतों में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग का उपयोग, वर्षा जल संचयन की व्यवस्था और फसल विविधीकरण। इसके अलावा मौसम संबंधी अपडेट पर नियमित नजर रखना भी बेहद जरूरी है।
जानकारी और जागरूकता की भूमिका
आज के डिजिटल युग में मौसम की जानकारी पहले से कहीं ज्यादा सुलभ है। समय-समय पर मिलने वाले अपडेट किसानों को सही निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं। मौसम के संकेतों को समझकर खेती की योजना बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है।
निष्कर्ष: सतर्कता और समझदारी से ही मिलेगा समाधान
आने वाला मानसून कई चुनौतियां लेकर आ सकता है, खासकर अगर एल-नीनो का प्रभाव मजबूत होता है। हालांकि अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन शुरुआती संकेत सतर्क रहने की सलाह देते हैं। किसानों के लिए जरूरी है कि वे बदलती जलवायु परिस्थितियों को समझें, विशेषज्ञों की सलाह पर ध्यान दें और अपनी खेती की रणनीति उसी अनुसार तैयार करें। सही जानकारी, समय पर निर्णय और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन ही इस अनिश्चितता के दौर में खेती को सुरक्षित रख सकता है।





